यशपाल शर्मा, लुधियाना
डिजिटल युग में जब मोबाइल और इंटरनेट ने पूरी दुनिया को एक स्क्रीन तक सीमित कर दिया है, तब कला और संस्कृति से जुड़ाव लगातार कमजोर होता जा रहा है। आज की युवा पीढ़ी जहां वर्चुअल दुनिया में खोती जा रही है, वहीं कुछ कलाकार ऐसे भी हैं जो अपने काम से समाज को उसकी जड़ों से जोड़ने में लगे हैं। प्रसिद्ध चित्रकार इंदरजीत चित्रकार उन्हीं में से एक हैं। वे अपने ब्रश और रंगों के माध्यम से पंजाबी सभ्याचार, सिख इतिहास और विरासत को फिर से जीवंत बना रहे हैं।
सरस मेले में सजी विरासत की झलक
पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (पी.ए.यू.) लुधियाना में चल रहे सरस मेले में इंदरजीत चित्रकार का स्टॉल कला प्रेमियों का विशेष आकर्षण बना हुआ है। उनके स्टॉल पर लोग दूर-दूर से पहुंच रहे हैं ताकि पंजाबी सभ्याचार और सिख इतिहास से जुड़ी उनकी पेंटिंग्स को करीब से देख सकें। रंगों में डूबी हुई इन कलाकृतियों में जहां पंजाब की मिट्टी की खुशबू झलकती है, वहीं सिख गुरुओं के आदर्शों और बलिदानों का संदेश भी मिलता है।
इंदरजीत मानसा बताते हैं कि उन्होंने सन 1978 में अपनी पहली पेंटिंग “जट्टी मुरब्बेयां वाली बत्ता लै के चली” बनाई थी। यह पेंटिंग इतनी लोकप्रिय हुई कि आज भी पंजाब के सैकड़ों घरों की दीवारों की शोभा बढ़ा रही है। इसके बाद 1990 में उन्होंने औपचारिक रूप से चित्रकारी की शिक्षा प्राप्त की और फिर उन्होंने खुद को इस कला के प्रति पूरी तरह समर्पित कर दिया।
गुरुओं और इतिहास से प्रेरित कला
इंदरजीत चित्रकार की रचनाओं में सिख गुरुओं का जीवन, उनकी शिक्षाएं और सिख इतिहास के महत्त्वपूर्ण प्रसंग प्रमुख रूप से दिखाई देते हैं। उन्होंने गुरु नानक देव जी, गुरु गोबिंद सिंह जी और गुरु तेग बहादुर जी के जीवन से प्रेरित कई पेंटिंग्स बनाई हैं। विशेष रूप से गुरु तेग बहादुर जी की शताब्दी को समर्पित उनकी एक पेंटिंग चर्चा का विषय बनी हुई है। इस पेंटिंग को वे जल्द ही शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एस.जी.पी.सी.) को भेंट करेंगे ताकि इसे श्रद्धालु दर्शनीय रूप में देख सकें। उन्होंने बताया कि वह पहले भी गुरु साहिबान से जुड़ी कई पेंटिंग्स एस.जी.पी.सी. को समर्पित कर चुके हैं। उनका मानना है कि यह पेंटिंग्स केवल कला नहीं बल्कि भक्ति और संस्कृति का प्रतीक हैं।
कला के जरिए समाज सेवा
इंदरजीत मानसा न सिर्फ एक कलाकार हैं बल्कि समाजसेवा में भी सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। कुछ समय पहले पंजाब में आई बाढ़ के दौरान उन्होंने अपनी कलाकृतियों से प्राप्त धन को बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए दान किया। चंडीगढ़ की ललित कला अकेडमी में लगी एक प्रदर्शनी में उनकी दो पेंटिंग्स शामिल थीं, जिनमें से एक की बिक्री से प्राप्त राशि उन्होंने पूरी तरह राहत कोष में दे दी। उनका कहना है, “कला सिर्फ देखने के लिए नहीं, बल्कि समाज के काम आने के लिए भी होनी चाहिए।”
50 से अधिक प्रदर्शनियों में भागीदारी
अब तक इंदरजीत चित्रकार 50 से अधिक राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय प्रदर्शनियों में हिस्सा ले चुके हैं। उन्होंने कई वर्कशॉप्स और कला शिविरों का आयोजन भी किया है, जिनमें वे युवाओं को चित्रकारी की बारीकियां सिखाते हैं। उनका उद्देश्य है कि नई पीढ़ी केवल मोबाइल की स्क्रीन पर नहीं, बल्कि अपने हाथों से कुछ रचने की प्रेरणा भी पाए।
युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत
इंदरजीत का कहना है कि आज की पीढ़ी को अपनी विरासत से जोड़ने का सबसे प्रभावी माध्यम कला हो सकता है। उनकी पेंटिंग्स में रंगों के साथ इतिहास की आत्मा बसती है। वे कहते हैं, “अगर हम अपनी संस्कृति को भूल जाएंगे, तो आने वाली पीढ़ियों को अपनी पहचान नहीं मिलेगी। मैं चाहता हूं कि मेरे ब्रश से उभरी हर तस्वीर युवाओं के दिल में अपनी जड़ों के प्रति गर्व जगाए।”
संस्कृति की धरोहर को सहेजने की कोशिश
मानसा जैसे कलाकार यह साबित करते हैं कि तकनीक के दौर में भी रचनात्मकता और परंपरा साथ चल सकती है। उनकी कला केवल चित्र नहीं, बल्कि पंजाब के गौरवशाली इतिहास और सिख परंपरा की जीवंत गवाही है। इंदरजीत चित्रकार मानसा ने यह दिखा दिया है कि जब जुनून, श्रद्धा और उद्देश्य साथ हों, तो रंग भी बोल उठते हैं। उनकी पेंटिंग्स केवल दीवारों की शोभा नहीं, बल्कि संस्कृति की सांसें हैं, जो हर देखने वाले को यह संदेश देती हैं कि अपनी जड़ों से जुड़ना ही सच्ची प्रगति है।
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Yashpal Sharma (Editor)