चंडीगढ़। पंजाब सरकार की लैंड पूलिंग पॉलिसी पर आज, 7 अगस्त को पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में लगातार दूसरे दिन सुनवाई हुई। अदालत ने पॉलिसी पर रोक लगा दी है। पंजाब सरकार को 4 हफ्ते में जवाब दाखिल करने के लिए कहा गया है। जल्दी ही अदालत के आदेश जारी होंगे। उसके बाद सारी स्थिति साफ हो पाएगी। याचिकाकर्ता के वकील चरनपाल सिंह बागड़ी ने अदालत के बाहर मीडिया को यह जानकारी दी। यह जनहित याचिका लुधियाना के रहने वाले एक एडवोकेट द्वारा दायर की गई है। वकीलों ने बताया कि उन्होंने अदालत में कई तर्क रखे । किसानों का कहना था कि 1947 में जब देश का बंटवारा हुआ था, तब भी किसानों को नुकसान हुआ था। अभी तक उनका कुछ नहीं हो पाया। मोहाली में लैंड पूलिंग पॉलिसी में कुछ लोगों को प्लॉट नहीं मिले है। अदालत ने पूछा कि जब 65 हजार एकड़ ज़मीन लैंड पूलिंग के तहत ली जाएगी, तो वहां उगाए जाने वाले अनाज का क्या होगा? और वहां काम करने वाले खेत मजदूरों का क्या भविष्य होगा? सरकार के वकीलों ने भी अपने पक्ष में तर्क रखे। इस पर अदालत ने कहा कि सरकार के पास दो विकल्प हैं—या तो वह यह नीति वापस ले ले, या फिर अदालत इसे रद्द कर देगी। हालांकि, सरकारी वकीलों ने कहा कि वे इस मामले में सरकार से चर्चा कर उचित जवाब दाखिल करेंगे। अंत में अदालत ने सरकार को जवाब दाखिल करने के लिए चार हफ्तों का समय दिया।
कोर्ट ने पॉलिसी पर उठाए दो सवाल
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने 2 अहम सवाल उठाए। पहला सवाल यह था कि क्या इस पॉलिसी के लिए पर्यावरणीय आकलन (Environmental Assessment Study) करवाया गया है। दूसरा सवाल था कि भूमिहीन मजदूरों और जमीन पर निर्भर अन्य लोगों के पुनर्वास के लिए क्या प्रावधान हैं। इस पर एडवोकेट जनरल मनिंदर सिंह ग्रेवाल ने कोर्ट से जवाब दाखिल करने के लिए समय मांगा और कहा कि यह नीति 7 अगस्त तक स्थगित रहेगी और तब तक कोई अगला कदम नहीं उठाया जाएगा। कोर्ट ने यह भी कहा कि "रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन बनाम चंडीगढ़ प्रशासन" मामले में यह स्पष्ट किया गया है कि शहरी विकास की अनुमति देने से पहले पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन आवश्यक होता है। पंजाब सरकार ने लैंड पूलिंग पॉलिसी में कुछ संशोधन भी किए थे। जिसे किसानों के हित में बताया था।
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