September 16, 2026 09:13:15
रामायण ज्ञान यक्ष -श्री सुंदरकांड जी का पाठ निराशा से आरंभ होता है आशा पर पूर्ण होता है- श्री कृष्ण

रामायण ज्ञान यक्ष -श्री सुंदरकांड जी का पाठ निराशा से आरंभ होता है आशा पर पूर्ण होता है- श्री कृष्ण जी महाराज

Oct6,2019 | Yashpal sharma | ludhiana

रामायण ज्ञान यज्ञ के आठवें दिन की सभा में आदरणीय श्री कृष्ण जी महाराज (पिता जी) एवं पूज्य श्री रेखा जी महाराज (माँ जी) के पावन सानिंध्य में श्री स्वामी सत्यानन्द जी महाराज सरस्वती द्वारा रचित रामायण जी का परायण किया। पूज्य पिता जी महाराज कहते हैं रामायण का परायण चल रहा है। पावन भूमि है, पवन तरंगे हैं, लेकिन उन तरंगों को, उस कृपा को पाने के लिए पात्र बनना पड़ता है। हम सुंदरकांड का पाठ करने जा रहे हैं। सुंदरकांड का पाठ सुख में दुःख में हर परिस्थिति में करते हैं। सुख में शुकराना करने के लिए और दुःख में प्रार्थना करते हैं कि हमारी मुश्किल का निवारण हो, हमें अपनी मुसीबत से बाहर निकलने के लिए रास्ता दिखे। ज़िन्दगी में सुख और दुःख दोनों आएंगे। मगर प्रभु और गुरु पर आस और विश्वास होना चाहिए।शक्ति और बल हम सब में समाया हुआ है। बुद्धि का बल तर्क करना होता है और मन की शक्ति अपने गुरु पर पूर्ण विश्वास होता है। मनुष्य का सबसे बड़े दुश्मन भय और भ्रम है।रामायण ज्ञान यज्ञ में श्री सुन्दरकाण्ड जी का पाठ किया गया। पूज्य पिता जी महाराज जी ने कहा कि श्री सुंदरकांड जी का पाठ निराशा से आरंभ होता है आशा पर पूर्ण होता है। जब सफलता नहीं मिलती है अच्छे अच्छों का धैर्य टूट जाता है। सुग्रीव जी सीता जी को ढूंढने के लिए सब दिशाओ में अपने सैनिक भेजते है । अंगद जी और उन के साथी सीता माँ को ढूंढते ढूंढते निराश हो गए और अंत समुन्दर पास आ गए। विशाल समुंदर को देख कर वे निराश हो जाते हैं। मन के हारे हारे है, मन के जीते जीत है। वहाँ सब अपनी शक्तियों का बखान करते है। तब सम्पाती जी ने कहा 100 योजन वाले समुन्दर को कैसे पार करेंगे। सब अपनी अपनी शक्तियों का बखान करते है कौन कितना कितना योजन जा सकता है जाम्बवान जी ने कहा हमारे साथ हनुमान जी है। जो जहां भी जावें बिगड़े काम बनावे। जामवन्त जी सब को हनुमान जी की शक्ति के बारे बताते है कि हनुमान जी बचपन में इतने बुद्धिमान और बलवान थे, कि वो अपने गुरु से आगे निकल जाते थे। इस लिए गुरु ने उनको श्राप दिया था की वे अपनी सब शक्तियां भूल जाएं। साथ में यह भी यह भी कहा था कि जब कोई उन को उन की शक्तियां याद करवाएगा तो वह वापिस आ जाएंगी। फिर सब उनको प्रेरित करते है और उनकी शक्तियों को जगाते है। हनुमान जी विशाल रूप धार कर समुन्द्र को पार कर लंका पहुंचते हैं। सीता जी की खोज हनुमान जी ने जगह जगह की लंका में पर वह नहीं मिली। निराश हो कर हनुमान जी मरने का सोचते है। महाराज जी का कहना है यह पल बड़ो बड़ो पर आ जाता है। मनोबल टूट जाता है। जो उधमी और साहसी है, उसको सफलता मिलती है। जब तक स्वास है, तब तक आस है। ढूंढते ढूंढते एक वाटिका सीता माँ को देख कर हनुमान जी बहुत उदास हुए। वह देखते है कि रावण सीता जी प्रलोभन दे रहा है की वह मेरी पत्नी बन जाए। रावण बार बार प्रलोभन देता हैं माँ भवानी को, पर माँ सीता एक नहीं सुनती और माँ सीता कहती है हे रावण अपनी पत्नी से प्रीति कर। फिर माँ सीता कहती हैं, रावण जो तू चाहता है वो पूरा नहीं होगा। तेरे व्यवहार से ऐसा लगता है कि लंका नगरी में संत नहीं रहते या रहते है तो तेरे से डरते है, तभी तेरे पास सद्बुद्धि नही है। तेरे व्यवहार के कारण जो सोने की लंका है अब चूर होने होने वाली है तू राम जी से मैत्री कर ले उनके शरणागत हो जा। नहीं तो राम जी और लक्ष्मण जी के बाण से तेरे कुल वंश का नाश हो जाएगा। जीवन में ऐसे बहुत व्यक्ति मिलेंगे जो आपको कुपथ पर ले जाएंगे पर सुपथ पर ले जाने वाले बहुत कम मिलेंगे। माँ सीता जी को आसुरियों ने कितना तंग किया पर वो बिल्कुल नहीं घबराई ।। हनुमान जी ने लंका मे आ कर सीता जी को अपना परिचय दिया और राम जी की अंगूठी दी पहचान चिन्ह के रूप में। तब माँ ने राम जी के बारे में पूछा तब हनुमान जी ने जवाब दिया प्रभु राम को ना खाने की सुध है, ना पहनने की सुध है। उन को कीड़ा काट ले उसकी उतनी पीड़ा नहीं है, जितनी आप के वियोग की पीड़ा है। राक्षस हनुमान जी को पकड़ कर रावण के पास ले जाते है, तो वह उसे राम जी का संदेश देता है जिस को सुन रावण हनुमान जी की पूंछ में आग लगा देता है। हनुमान जी लंका को जला कर अपने साथियों के पास समुंदर किनारे आ जाते है। सुग्रीव को अंगद के दल का हंसी खुशी आने का पता चलता है तो वह राम जी के पास आ कर कहते हैं यह सफल हो कर आये है मुझे विश्वास है । हनुमान जी से मिलने के लिए राघव जी ने कहा और आते ही हनुमान जी ने कहा देखी है मैंने सती जीवित है और बिन हानि के है। राघव जी भाव विभोर हो गए और हनुमान जी कहते है माँ भवानी हर सांस से आपका चिंतन करती है। सीता माँ ने कहा है की रावण ने मुझे दो महीने की अवधि दी है अगर आप ना आये तो रावण मुझे काट कर खा जाएगा। हनुमान जी ने लंका की सारी कहानी बताई और राघव जी को सीता माँ की चूड़ामणि देते है । राम जी हनुमान जी को गले से लगा लेते है, गुरु शिष्य का यह मिलन बहुत उत्तम है। वह कहते है, हे वीर हनुमान अपना सारा जीवन भी दे दूँ तब तेरा यह एहसान नहीं चुका सकता ।राघव जी और हनुमान जी गले मिल कर भाव विभोर हो जाते है। राम जी ने सुग्रीव जी से युद्ध की तैयारी को कहते है। राम जी सभी का साथ सेना लेकर समुंदर किनारे पहुंचते है। पुज्य स्वामी जी महाराज ने श्री हनुमान जी की वीरता और गुरुभक्ति का गुणगान करते हुए लिखा है कि: जगत में होते भक्त बहुतेरे, कोप कपट कलि मल के डेरे। दम्भ आडम्बर रच दिखाते, वेश केश बहु रूप बनाते।। नव नव रचते मार्ग माया, फिरते पाप कर्म की काया। पर जो होते भक्त सियाने, कर्म गुणों से जाते जाने।। डरते जो ही मरते सो ही, वीर जन को डर नहीं कोई। जग में दुर्बल दास कहाते, भीरु ही दीन दुःखी दिखलाते।। बुद्धि काम में जो जन लाते, पहले पूरा वार चलाते। बनते बहुधा वही विजेता, साहस वान जनों के नेता।। बली वीर पर वार चलाना, सुप्त-सिंह है आप जगाना। हाथ सर्प-बिम्बी में देना, मग में मृत्यु मोल है लेना।। पूज्य पिता जी महाराज ने कहा कि सीता जी जब रावण की कैद में थी तो उन्हों ने भगवान से प्रार्थना कि: नाथ! हाथ लघु साथ बढ़ाना, अपनी को रघुनाथ बचाना।। दीन दुःखी पर दया दिखलाई, देव दलित के हुए सहाई, तुमने पापी पतित उद्धारे, दुष्ट दस्यु दुर्जन भी तारे।। करुणा कर को आज पसारो, अपनी को विपदा से तारो। लाज शर्म है हाथ तुम्हारे, सर्व नाथ रघुनाथ हमारे।। श्री राम जी और हनुमान की गुरु शिष्य की जोड़ी के लिए पुज्य महाराज जी ने लिखा है कि: सरल सत्य से जो अपनाते, बन्धु बनते प्रेम के नाते । रघुराज हनुमान् सी जोड़ी, सुगुरु शिष्य की मिलती थोड़ी।। गुरुवर भी होते सुखदाई, बनते जो पिता और माई। शिष्य जनों पर जाते वारे, भेद भाव से रहते न्यारे।। उन के होते जन अनुयायी, जो ना स्वार्थ मोह युत मायी। अनुगामी पर जीवन देते, मधुर वचन से मन हर लेते।। पूज्य पिता जी महाराज ने कहा कितने शुभ कर्म किये होंगे हमनेनवरात्रों के पावन दिन उस पर से दुर्गा अष्टमी का दिन उस पर आज सुंदरकांड जी के पाठ का परायण और रामायण जी के परायण में शामिल होने का हमें सुअवसर मिला।श्री कृष्ण जी महाराज (पिता जी) एवं पूज्य श्री रेखा जी महाराज (माँ जी) के पावन सानिंध्य नौ दिनों से चल रहे ज्ञान यज्ञ,सेवा यज्ञ और जप यज्ञ जिस में हज़ारों की संख्या में साधक सम्मलित होकर अपना जीवन धन्य कर रहे हैं, की पूर्ण आहुति मंगलवार 08 अक्टूबर प्रातः 8 से 10 बजे होगी। पूज्य पिता जी महाराज ने सभी साधकों इस यज्ञ की पूर्णाहुति में सम्मलित होने की प्रेरणा दी।

Ramayan Gyan yugya 2019



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