ई न्यूज पंजाब, लुधियाना अब पंजाब प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड की ओर से शहर के ऐसे कारोबारी जिनकी इंडस्ट्री से 50 हजार लीटर का रोजाना का डिस्चार्ज है, को अब अपने डिस्चार्ज के पैरामीटर नापने को आनलाइन मानिटरिंग को मीटर जरुरी कर दिया है। ये मीटर उन इंडस्ट्री को लगाने की जरुरत नहीं, जो शहर में लगाए जा रहे तीन सीईटीपी के मैंबर हैं। पीपीसीबी के इस फरमान के बाद अब ऐसी लार्ज इंडस्ट्री जिनकी ओर से अगले तीन चार महीने में खुद के यूनिट को जीरो लिक्विड डिस्चार्ज करने की तैयारी की जा रही है, पर भी इस मीटर की अनिवार्यता पर सवाल उठने लगे हैं। इस मीटर की कीमत 6 से 8 लाख रुपए हैं और ऐसे में उक्त यूनिटों का जब तीन चार महीने बाद डिस्चार्ज ही जीरो हो जाएगा तो वे मीटर लगाकर क्या करेंगे। वहीं इस मीटर पर बड़ा सवाल ये खड़ा हो रहा है कि क्या बोर्ड मीटर लगने के बाद इन इंडस्ट्री से सैंपल नहीं लेगा। वहीं अगर सैंपल लेता है तो अगर आनलाइन मीटर के पैरामीटर और सैंपल के पैरामीटर में फर्क आता है, तो इसका समाधान कैसे करेगा। यूपी सहित कईं अन्य राज्यों में कामयाब नहीं ये फंडा बात करें इंडस्ट्रियल डिस्चार्ज पर लगने वाले मानिटरिंग मीटर की तो ये भले ही पंजाब की इंडस्ट्री के लिए नई बात है, लेकिन यूपी, गुजरात सहित कईं राज्यों में इस मीटर का फंड पिछले करीब दो तीन साल से चल रहा है। लेकिन वहां भी ये मीटर प्रदूषण रोकने में अधिक सहायक सिद्ध नहीं हो पाया है। असल में इन मीटरों के जरिए केवल सीओडी का फैक्टर लिया जाता है और इससे ही बीओडी व भी डिस्चार्ज में बीओडी, सीओडी व पीएफ के फैक्टर को बदला जा सकता है। इलेक्ट्रोड वाले मीटर में बदलाव संभव हैं और यही विवाद अब यूपी व अन्य राज्यों में चल रहा है। अब तो सीपीसीबी व अन्य बोर्ड की ओर से गलत फैक्टर दिखाए जाने के चलते वैंडर पर भी जुर्माना लगाया जा रहा है। इससे भी इंडस्ट्री की मुशिकलें कम होने वाली नहीं हैं। मीटर लगने के बाद भी इंडस्ट्री को बोर्ड और वैंडर का ब्लैकमेल झेलना पड़ेगा। टेकन छाबड़ा, एक्सपर्ट दिल्ली (गंगा प्राेजेक्ट पर काम कर रहे है)
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