यशपाल शर्मा, लुधियाना सिधवां कनाल वॉटर फ्रंट प्रोजेक्ट विवाद सीएम हाउस तक पहुंचने की चर्चा जोरों पर है और अब इस पूरे विवाद के कौन कौन से अफसर गुनाहगार हैं कि तलाश भी शुरु हो गई है। अब इस बात पर चर्चा शुरू हो गई कि क्या इस प्रोजेक्ट की प्लानिंग में कोई कमी थी या फिर जंगलात विभाग के एक्शन में कहीं कोई गड़बड़ी है। जंगलात विभाग की ओर से बीते बुधवार शाम को पौने पांच करोड़ रुपए की लागत से सिधवां कनाल के साथ बने वॉटर फ्रंट प्रोजेक्ट में की गई तोड़फोड़ मामले में अब आम आदमी पार्टी के विधायक गुरप्रीत गोगी की एंट्री हो गई है। आज गोगी ने नगर निगम, जंगलात विभाग और इंप्रूवमेंट ट्रस्ट के अधिकारियों को साथ ले नगर निगम जोन डी के साथ बने वाॅटर फ्रंट प्रोजेक्ट का दौरा किया और इस पूरे मामले में गोगी ने तीन विभागों के अधिकारियों से जबावतलबी की है। विधायक गोगी इस पूरे प्रकरण में आज विभागीय अधिकारियों पर इस बात को लेकर फटकार लगाते दिखे कि इस कार्रवाई से पहले डेमोलेशन आर्डर क्यों नहीं जारी किया गया और लाखों रुपए के इस नुकसान के लिए कौन जिम्मेदार है। इस दौरान उन्होंने ये भी साफ कर दिया कि इस पूरे नुकसान की भरपाई जिम्मेदार अधिकारियों की जेब से की जाएगी। चाहे ये गड़बड़ी प्लानिंग में हुई हो या इसके बाद इस कमी को दूर करने में। लेकिन बड़ी बात है कि विधायक गोगी भी अभी इस पूरे विवाद की नब्ज पकड़ने से रास्ता भटकते दिखे। इस प्रोजेक्ट की पूरी प्लानिंग की भी खुलेगी पोल करीब 475 करोड़ रुपए के इस प्रोजेक्ट में कईं ऐसे बिंदु हैं, जिन्हें लेकर इस पूरे प्रोजेक्ट की प्लानिंग पर सवाल खड़े होते दिख रहे हैं। नगर निगम अफसरों का कहना है कि उनकी ओर से जंगलात विभाग की ये जमीन जिस पर पूरा प्रोजेक्ट पब्लिक के लिए तैयार किया गया, उसकी मंजूरी जंगलात विभाग से ली गई है। अब सवाल खड़ा होता है कि जंगलात विभाग ने इस प्रोजेक्ट के लिए नगर निगम को मंजूरी दी या नगर निगम अफसरों ने किसी राजनीतिक दबाव में आ इस प्रोजेक्ट को हरी झंड़ी देते हुए तैयार कर दिया। असल में इस प्रोजेक्ट के लिए पूर्व कैबिनेट मंत्री भारत भूषण आशू काफी दिलचस्पी ले रहे थे और स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट में दो अफसर ऐसे हैं, जिन पर आशू और उनकी पत्नी ममता आशू का पूरा आशीर्वाद रहा। यही कारण है कि लुधियाना स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट पर काम कर रही कंस्लटेंट कंपनी की ओर से नगर निगम अफसरों के इशारे पर एबीडी (एरिया बेस्ड डेवलेपमेंट) में आए हिस्से में जो कुछ भी छोटा मोटा प्लान किया गया, उसे चंडीगड़ से लेकर दिल्ली तक मंजूरी मिलती चली गई। लेकिन यहां ये सवाल खड़ा होता है कि क्या ये जगह जो नहर के एकदम किनारे हैं, में एक किलोमीटर लंबा वाकिंग पाथ व साइकिल ट्रैक बनाने की मंजूरी जंगलात विभाग ने दी, ये एक पड़ताल का मुददा है। इसके बाद जब नगर निगम की ओर से इस प्रोजेक्ट का कांट्रेक्ट कांट्रेक्टर को दिया गया, तब कौन कौन से अफसर इसकी निगरानी कर रहे थे और किस किस अफसर की सहमति से इस वर्क में जुटे कांट्रेक्टर को पेमेंट की गई। असल में शिकायतकर्ता इंजीनियर कपिल अरोड़ा की ओर से वृक्षों को बचाने के लिए एनजीटी में याचिका दायर की गई, उस प्वाइंट पर निगम के अफसरों की प्लानिंग कैसे लापरवाह रही। असल में नगर निगम अफसरों की अगर पिछली हिस्ट्री देख ली जाए तो इसमें कोई शक नहीं कि वे जनता के फंड को उजाड़ने में सबसे आगे हैं। इसका बड़ा उदाहरण पक्खोवाल इंडोर स्टेडियम है, जिसे पहले तो 16 करोड़ में पुरा करने की बजाय 80 करोड़ में पूरा किया गया, वहीं आज के हालात देखों तो यहां पर इंडोर गेम्स नहीं, ब्लकि इसे बुकिंग पर देकर कभी एग्जीबिशन, सेल और कोई अन्य प्रोग्राम करवाए जा रहे हैं। कहने का मतलब नगर निगम के अफसर केवल खर्च करना जानते हैंक्यों कि इसी खर्च से उनकी कमिशन का खेल चलता है, लेकिन अगर इन प्रोजेक्टों के मेनटेंनेंस व इस्तेमाल की बात करें तो इसकी कोई प्लानिंग उनके पास नहीं है। लुधियाना में ऐसे तमाम तरह के उदाहरण है जहां नगर नगम अफसरों की नालायकी सरेआम देखी जा सकती है। ऐसे में जब तक ऐसे नालायक अफसरों को टारगेट नहीं किया जाता तब तक जनता के फंड की बर्बादी लगातार जारी रहेगी। 13 अप्रैल को नगर निगम व जंगलात विभाग के अफसर अपने रिकार्ड सहित अपना पक्ष रखेंगे और इसके बाद पूरी स्थिति से भी पर्दा उठ सकेगा। ------------ सड़कों के साथ खाली छोड़े जाने वाली कच्ची जगह पर लग गई टाइलें नियमों के तहत सड़कों के साथ कच्ची जगह बरसाती पानी व अन्य तरह के पानी की निकासी को खाली छोड़ी जाती है, लेकिन लुधियाना का वेस्ट हल्का एक ऐसा हल्का है, जहां सड़कों के कच्चे हिस्से को टाइलों से ढक दिया गया और इसके पीछे कारण केवल अधिकारियों व नेताओं के कमीशन का खेल है। असलियत है कि अगर आप जहां कहीं भी सड़कों के किनारे टाइलें लगी हैं, वहां अगर छह महीने बाद के हालात देखेंगे तो वहीं नई टाइलें पुरानी लगने लगती हैं और कईं जगहों से ये टाइलें बैठ भी चुकी होती हैं। कारण ये है कि इन टाइलों की वाशिंग को निगम या ट्रस्ट के पास कोई प्रबंध नहीं और साल डेढ़ साल बाद इन्हीे नई टाइलों को पुराना व टूटा कहकर दोबार से बदल अफसर कमीशन के खेल को अंजाम दे जाते है। इसी कमीशन के खेल में अफसर शहर में बचे कुचे पेड़ों को भी इन टाइलों से घेर फंदा लगा रहे हैं और अगर इन पर आज कोई एक्शन नहीं लिया जाता तो शायद एक दशक बाद आपके शहर में हरे भरे पेड़ भी दिखने बंद हो जाएंगे।
After All Who Are The Real Culprits Of The Sidhwan Canal Water Front Project Dispute