इंप्रूवमेंट ट्रस्ट में एलडीपी प्लाट घोटाला, रिश्वतखोरी और सरकारी प्रॉपर्टी की नीलामी में बड़ा घोटाला किए जाने के मामले में विजिलेंस की ओर से दर्ज एफआईआर मामले में वीरवार को पूर्व ट्रस्ट चेयरमैन रमण बाला सुब्रामनियम की जमानत याचिका को खारिज कर दिया, लेकिन इस मामले में एडिश्नल सेशन कोर्ट के स्पेशल जज डा.अजीत अत्री की ओर से जो आर्डर किया है, वो रिश्वतखोरों और राजनीतिक प्रतिशोध को मुददा बनाकर कोर्ट में जमानत याचिका लगाने वालों के लिए एक बड़ा संदेश बनकर सामने आया है। जिस ढंग से कोर्ट ने ये आदेश जारी किए हैं, उससे साफ है कि रमण बाला सुब्रामनियम के लिए अब हाईकोर्ट में जाकर अग्रिम जमानत लेना आसान नहीं होगा। दोनों पक्षों को सुनने के बाद अपने आदेश में स्पेशल जज डा अजीत अत्री ने कहा कि राजनीतिक प्रतिशोध कभी-कभी एक आकर्षक शब्द होता है, लेकिन जब जांच के दौरान पूरी भूमिका आरोपी पर बन रही हो तो राजनीतिक प्रतिशोध जैसी दलील ढाल लेकर भागने की नियमित गुहार बन जाती है। आदेश में कहा गया है कि प्लॉटों का आवंटन कोर्ट या किसी अन्य प्राधिकारी के आदेश के अनुसरण में हो सकता है, लेकिन आरोप है कि अवैध रूप से रिश्वत लेने के बाद इन प्लाॅटों को अलॉट किया गया । आश्चर्यजनक रूप से रिकॉर्ड की फोटोकॉपी आवेदक (रमण बाला सुब्रामनियम) द्वारा रखी गई थी, जिससे पता चलता है कि वह आलॉट होने वाले प्लाॅट के सभी ट्रैक रख रहा है और ये आवदेक की पूरी रुचि को दर्शाता है। यह असामान्य है कि पूरे रिकार्ड की कापी आवेदक के पास इस रूप में उपलब्ध है। बहस के दौरान सामने आया कि आवेदन के एलडी कौंसिल के पास प्लॉट नं. 38बी, 9बी, 106डी पूरा रिकार्ड मौजूद था। केस के मुताबिक इल्लीगल रिश्वत आवदेक ने स्वयं या अन्य व्यक्ति के माध्यम से प्राप्त की थी, ये अभी जांच की शुरुआती विषय है। लेकिन आवेदक के वकील की ओर से राजनीतिक प्रतिशोध के चलते झूठे आरोप लगाना का दावा आवेदक की विशिष्ट भूमिका और भागीदारी को देखते हुए अधिक बल नहीं देती। विजिलेंस के सरकारी वकील ने यह भी कहा है कि प्लॉट नं. 106 डी की मूलरुप से विस्थापित व्यक्ति को नहीं की गई। जबकि विस्थापित प्रेमनाथ सूद व उनका पोता इंद्रजीत सूद पहले की मर चुके हैं और ऐसे में उनका मुख्तारनामा जबकि साथ ही उसका पोता पहले ही मर चुका है और जिस व्यक्ति को ये प्लॉट ड्रा के द्वारा दिया गया, वे वास्तविक विस्थापित व्यक्ति है और वे एक मुख्तारनामा होल्डर है। ऐसे में मरे हुए व्यक्ति का मुख्तारनामा कैसे इस मामले में स्टैंड करता है, ये आवेदक को बताना है। जांच अभी बहुत शुरुआती चरण में है और ऐसा लग रहा है आवेदन की भूमिका सीधे तौर पर इनमें है। राजकोष को हुए वित्तीय नुकसान का ठीक-ठीक आकलन ऐसे संभव नहीं है और जांच आगे बढ़ने पर और भी कई मामले सामने आ सकते हैं। इसी तरह के अन्य मामलों में आवेदक की विस्तृत भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता है। वहीं ई-आक्शन पोर्टल के साथ छेड़छाड़ के आरोप और वहीं इसकी विस्तार से जांच की जानी है। जज ने अपने आदेश में साफ किया है कि ई आक्शन के डिजिटल प्लेटफार्म में किसी को भी भौतिक रुप में वहां पहुंचने की जरुरत नहीं, जहां सर्वर स्थित है, बल्कि यह टैंपरिंग कहीं से भी संभव हो सकता है। रमण बाला के वकील पवन घई की ओर से कोर्ट में ये तर्क की उनके आवेदक ने रिश्वत ली, इसका कोई गवाह नहीं है और ये साबित कैसा होता है, पर जज ने साफ किया कि एक झूठ लेकिन दस्तावेज नहीं है, ये अब पुरानी कहावत है। इसमें ऐसे नहीं हैं कि कुछ छोटी-छोटी अनियमितताएं हैं जो कि हो सकती हैं, बल्कि आरोपों से पता चलता है कि कारपेट के ऊपर व नीचे बहुत कुछ है। आवेदक के खिलाफ आरोप गंभीर प्रकृति के हैं और आवेदक को झूठे फंसाने के किसी कारण का अनुमान लगाने के लिए कुछ भी फाइल में नहीं है। मामले की उचित जांच के लिए हिरासत में पूछताछ की आवश्यकता होगी। कोर्ट की ओर से प्यारा सिंह बनाम पंजाब राज्य 2021 (2) RCR आपराधिक 590 के मामले में गिरफ्तारी पूर्व जमानत एक विवेकाधीन राहत है और होना भी चाहिए। ऐसा असाधारण मामलों में किया जाता है और पर नियमित रूप से नहीं। यह मासूमों को बचाने के लिए है। वहीं राज्य बनाम अनिल शर्मा 1997 (4) आरसीआर आपराधिक 268 के मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने देखा कि जमानत लिए व्यक्ति के मुकाबले हिरासत में पूछताछ अधिक गुणात्मक रुप से बेहतर है। प्रभावी जांच के लिए हिरासत में पूछताछ आवश्यक है। अपराध की योजना बनाना और उसके निष्पादन का तरीका, इसमें शामिल अन्य व्यक्ति और उनमें से प्रत्येक द्वारा निभाई गई भूमिका की पड़ताल हिरासत में रखकर बेहतर ढंग से हो सकती है। इस तरह से हुआ ये मामला शुरु अभियोजन का मामला संक्षेप में यह है कि प्राथमिकी सं.08 से संबंधित मामला है। भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7, 7-ए के तहत दिनांक 14.07.2022 1988 संशोधन अधिनियम 2018 और 120-बी आईपीसी पुलिस स्टेशन द्वारा संशोधित के रूप में विजिलेंस ब्यूरो, आर्थिक अपराध शाखा पंजाब, लुधियाना ने दर्ज किया गया था। जिसमें हरमीत सिंह सहायक क्लर्क लुधियाना इंप्रूवमेंट ट्रस्ट, परवीन कुमार सेल्स क्लर्क,कुलजीत कौर ईओ इंप्रूवमेंट ट्रस्ट लुधियाना को रिश्वत के मामले में पकड़ा गया था। ------ विजिलेंस की ओर से दर्ज एफआईआर में कुछ नामजद और कईयों की भूमिका आई सामने विजीलैंस ब्यूरो पंजाब की ओर से दर्ज की गई एफआईआर में रमण बाला सुब्रामनियम के साथ साथ पांच लोग नामजद किए गए, जबकि कुछ लोगों के नाम एफआईआर का हिस्सा बनाए गए हैं। विजिलेंस की ओर से दर्ज की गई एफआईआर में ईओ कुलजीत कौर ने अपने बयान में किया है। कुलजीत कौर ने विजिलेंस के समक्ष मान लिया है कि माडल टाउन एक्सटेंशन 3.79 एकड़ जमीन की ई आक्शन में रमण बाला सुब्रमानियम अपने चहेतों को बड़ा फायदा पहुंचाना चाहते थे। इन बडे़ स्तर के घोटालों में कईं प्रॉपर्टी डीलर्स, इंजीनियरिंग विंग के अधिकारी व लोकल गर्वमेंट के बडे़ अफसरों की इंवोल्वमेंट भी इस एफआईआर में बताई गई हैं। विजिलेंस की ओर से दर्ज की गई एफआईआर में मोटी रिश्वत लेकर प्रेमनाथ सूद की एलडीपी के एवज में ऋषि नगर में 100 फुटी रोड पर ड्रा के जरिए मनपसंद 106 डी प्लॉट की अलाॅटमेंट करने का खुलासा किया गया है। इस पूरी एफआईआर में चंडीगढ़ रोड निवासी प्रॉपर्टी डीलर संजय जैन (जिसका छोटा भाई नगर निगम में जोनल कमिश्नर है) का नाम दर्ज किया गया है। संजय जैन की ओर से प्रेमनाथ सूद की एलडीपी अलॉटमेंट करवाने के लिए दो बार 25-25 लाख रुपए की रिश्वत ईओ के जरिए तत्कालीन चेयरमैन रमण बाला सुब्रामनियम को देने व ईओ कुलजीत कौर की ओर से अलग 5 लाख रुपए लेने का खुलासा किया गया है। बताया जाता है कि डीलर संजय जैन भी फरार है और उसकी तलाश में भी छापामारी जारी है। इसके अलावा चेयरमैन का पीए संदीप शर्मा व खुद चेयरमैन रमण बाला सुब्रामनियम मोटी रिश्वत लेकर फाइलें कुलजीत कौर से क्लियर करवाने का जिक्र भी एफआईआर में किया गया है। इतना ही नहीं विजिलेंस की इस एफआईआर में पूर्व कांग्रेसी कैबिनेट मंत्री भारत भूषण आशू के पीए इंद्रजीत सिंह इंदी का जिक्र भी किया गया है। बताया जाता है कि इंद्रजीत सिंह इंदी की ओर से ट्रस्ट में होने वाले प्लॉटों व व एलडीपी की अलॉटमेंट में दखल रहता था और वे भी अफसरों को हुक्म जारी करता था। वहीं बीआरएस नगर में 64 व 100 गज के मकानों की रजिस्ट्री में जाली दस्तावेज का इस्तेमाल कर झूठे आलाटी खडे़ करके गलत रजिस्ट्रियां करवाने में क्लर्क गगनदीप की मिलीभगत ईओ की ओर से कबूली गई है। विजिलेंस की ओर से दर्ज की गई एफआईआर में इंजीनियरिंग विंग के एक्सईन व एसडीओ की ओर से ली जाने वाली और आगे दी जाने वाली रिश्वत का खुलासा भी कर दिया गया है। इस एफआईआर में बताया गया है कि पिछले दो साल में ट्रस्ट की ओर से 4 - 5 बार कार्मशियल व रिहायशी प्रॉपर्टी बेची गई और इसमें इंजीनियरिंग विंग के एसडीओ अंकित नारंग मेन सरगना था और वे साथ में प्राइवेट आईटी के एक्सपर्ट के साथ ई आक्शन के पूरे प्रोसिजर को टैंपर कर देता था और रमण बाला सुब्रामनियम से सेटिंग करने वालों को ई आक्शन में सरकारी प्रॉपर्टी दिला देता था। इस पूरे सिस्टम के लिए उसे पीए संदीप शर्मा, एक्सईन बूटा राम व एक्सईन जगदेव सिंह गाईड करते थे व इनके जरिए पूरी रिश्वत का लेनदेन होता था। इसके अलावा नगर निगम व ट्रस्ट की विभिन्न स्कीमों में भी डेवलपमेंट वर्क के बनने वाले चैक भी ईओ कुलजीत कौर की ओर से बनाए जाते थे। जिसमें चैक की कुल राशि का 50 पैसे ईओ का और 3 से 4 फीसदी कमीशन रमण बाला सुब्रामनियम की होने का दावा किया गया है। चेयरमैन को इस कमीशन की अदायगी कैश में एक्सईन बूटा राम व एक्सईन जगदेव सिंह की ओर से की जाती थी। वहीं लुधियाना ट्रस्ट मीटिंग में मिलीभगत से पास किए जाने वाले प्रस्तावों को चंडीगढ़ में मंजूरी वहां बैठे डीलिंग हैंड कुलदीप सिंह सीनियर अस्सिटेंट, सुपरिटेंडेंट दिनेश कुमार व सीनियर अधिकारियों को चेयरमैन रमण बाला सुब्रामनियम व ईओ कुलजीत कौर रिश्वत देकर पास करवाकर लाते थे। इसके साथ साथ सराभा नगर में किप्स मार्केट के पीछे एक स्कूल के लिए आलाट की गई 2000 गज जमीन में दो तीन स्कूल खोले जाने के मामले में भी ईओ कुलजीत कौर ने बताया कि ये अलाटमेंट की शर्तांं के खिलाफ था। इस संबंध रमन बाला सुब्रमण्यम चेयरमैन ने अलाटी से रिश्वत ली और उन्होंने कुलजीत कौर ईओ को कोई कार्रवाई करने से रोक दिया।
Court Stand Tough On Raman Bala Subramaniam Bail Plea