यशपाल शर्मा, लुधियाना। लोकसभा चुनाव से ठीक पहले भारतीय जनता पार्टी की ओर से पंजाब में बड़ा फेरबदल करते हुए पंजाब भाजपा अध्यक्ष की कमान कांग्रेस पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रहे सुनील जाखड़ को सौंप दी है। लोकसभा चुनाव से ठीक पहले भारतीय जनता पार्टी के इस फेरबदल ने भाजपा के संगठनात्मक ढांचे को बुरी तरह से हिला कर रख दिया है । देश के गृहमंत्री अमित शाह के पंजाब दौरे के बाद से लगातार यह कयास लगाए जा रहे थे कि भाजपा पंजाब में किसी बड़े तरह का फेरबदल कर सकती है और उसमें सुनील जाखड़ का नाम तेजी से उभर कर सामने आ रहा था । बड़ी बात है कि भाजपा के पंजाब भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अश्विनी शर्मा कांग्रेस और शिरोमणि अकाली दल से शामिल होने वाले दिग्गज नेताओं को पंजाब की राजनीति में सक्रिय करने में नाकामयाब साबित हुए और वह पार्टी में आने वाले कई दिग्गज नेताओं को सही मायने में बनता सम्मान तक नहीं दिला पाए। इतना ही नहीं पार्टी के कई अहम फैसलों में भी इन दिग्गज नेताओं की राय तक नहीं ली जाती थी। जानकर बता रहे हैं कि अमित शाह के पंजाब दौरे के दौरान यह मामला भाजपा पार्टी हाईकमान तक गरमा गया। इसके साथ-साथ अश्विनी शर्मा जालंधर लोकसभा चुनाव में भी बड़े चेहरे होने के बावजूद पार्टी को वे नतीजा नहीं दे पाए जिसका अनुमान लगाया जा रहा था। -- पंजाब भाजपा में अब नई कार्यकारिणी का भी होगा गठन सुनील जाखड़ को पंजाब की कमान मिलने के बाद अब जल्द ही पंजाब में भाजपा का बदला बदला रूप नजर आएगा । इसका कारण है कि जल्द पंजाब में सुनील जाखड़ प्रदेश की नई कार्यकारिणी का गठन करने वाले हैं । इसमें प्रदेश महासचिव के पदों पर कई दिग्गजों की जगह मिल सकती है। अब ऐसे में भाजपा के जमीनी स्तर पर जुड़े नेताओं को भी आने वाले दिनों में दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है और उन्हें पार्टी में किस तरह से आगे चलकर सम्मान मिलता है यह भी देखने वाली बात रहेगी। अश्विनी शर्मा की नाकामयाबी में अन्य पार्टियों से भाजपा में आए नेताओं को सही स्थान पर फिट ना कर पाना ही उनकी कुर्सी छीनने का बड़ा कारण बना। ऐसे में सुनील जाखड़ के लिए भी नई कार्यकारिणी के गठन में इन्ही बातों को ध्यान में रखना बड़ी बात रहेगी कि आखिर इस तरह से भाजपा के दिग्गज और पुराने नेताओं को अपने साथ में लेकर चला जाए। भारतीय जनता पार्टी में कैप्टन अमरिंदर सिंह सहित कई अन्य दिग्गज नेताओं की ओर से भाजपा का दामन थामने के बाद अश्विनी शर्मा के लिए भी अपनी कुर्सी बचाए रख पाना बड़ा चैलेंज बना हुआ था और यही कारण है कि वे दिग्गजों को अपनी राजनीति से दूर रख कर पार्टी को बेहतर नतीजा देना चाहते थे, जिसमें वे कामयाब नहीं हो पाए।
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